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मोहनदास करमचंद गांधी
420 quotes
“स्त्री का अंतर्ज्ञान पुरुष के श्रेष्ठ ज्ञानी होने की घमंडपूर्ण धारणा से अधिक यथार्थ है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ५१)”
मोहनदास करमचंद गांधी (1869–1948) said by 1948 at the latest wikiquote:hi, CC BY-SA 4.0 source
“जो व्यक्ति अहिंसा में विश्वास करता है और ईश्वर की सत्ता में आस्था रखता है वह कभी भी पराजय स्वीकार नहीं करता। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ १६)”
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“समुद्र जलराशियों का समूह है। प्रत्येक बूंद का अपना अस्तित्व है तथापि वे अनेकता में एकता के द्योतक हैं। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ १४७)”
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“पीडा द्वारा तर्क मजबूत होता है और पीडा ही व्यक्ति की अंतर्दृष्टि खोल देती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ १८२)”
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“किसी भी विश्वविद्यालय के लिए वैभवपूर्ण इमारत तथा सोने-चांदी के खजाने की आवश्यकता नहीं होती। इन सबसे अधिक जनमत के बौद्धिक ज्ञान-भंडार की आवश्यकता होती है। -- (महात्मा, भाग ८ के पृष्ठ १६५)”
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“विश्वविद्यालय का स्थान सर्वोच्च है। किसी भी वैभवशाली इमारत का अस्तित्व तभी संभव है जब उसकी नींव ठोस हो। -- (एविल रोट बाइ द इंग्लिश मीडीयम, १९५८ पृष्ठ २७)”
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“मेरे विचारानुसार मैं निरंतर विकास कर रहा हूं। मुझे बदलती परिस्थितियों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करना आ गया है तथापि मैं भीतर से अपरिवर्तित ही हूं। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ २४)”
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“ब्रह्मचर्य क्या है ? यह जीवन का एक ऐसा मार्ग है जो हमें परमेश्वर की ओर अग्रसर करता है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ २४)”
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“प्रत्येक भौतिक आपदा के पीछे एक दैवी उद्देश्य विद्यमान होता है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ २४)”
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“सत्याग्रह और चरखे का घनिष्ठ संबंध है तथा इस अवधारणा को जितनी अधिक चुनौतियां दी जा रही हैं इससे मेरा विश्वास और अधिक दृढ होता जा रहा है। -- (महात्मा, भाग ५ के पृष्ठ २६४)”
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“हमें बच्चों को ऐसी शिक्षा नहीं देनी चाहिए जिससे वे श्रम का तिरस्कार करें। -- (एविल रोट बाइ द इंग्लिश मीडीयम, १९५८ २०)”
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“सभ्यता का सच्चा अर्थ अपनी इच्छाओं की अभिवृद्धि न कर उनका स्वेच्छा से परित्याग करना है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ १८९)”
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“अंतत : अत्याचार का परिणाम और कुछ नहीं केवल अव्यवस्था ही होती है। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ १०२)”
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“हमारा समाजवाद अथवा साम्यवाद अहिंसा पर आधारित होना चाहिए जिसमें मालिक मजदूर एवं जमींदार किसान के मध्य परस्पर सद्भावपूर्ण सहयोग हो। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २५५)”
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“किसी भी समझौते की अनिवार्य शर्त यही है कि वह अपमानजनक तथा कष्टप्रद न हो। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ ६७)”
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“यदि शक्ति का तात्पर्य नैतिक दृढता से है तो स्त्री पुरुषों से अधिक श्रेष्ठ है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ ३)”
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“स्त्री पुरुष की सहचारिणी है जिसे समान मानसिक सामथ्र्य प्राप्त है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९२)”
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“जब कोई युवक विवाह के लिए दहेज की शर्त रखता है तब वह न केवल अपनी शिक्षा और अपने देश को बदनाम करता है बल्कि स्त्री जाति का भी अपमान करता है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९८)”
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“धर्म के नाम पर हम उन तीन लाख बाल-विधवाओं पर वैधव्य थोप रहे हैं जिन्हें विवाह का अर्थ भी ज्ञात नहीं है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २२७)”
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“स्त्री जीवन के समस्त पवित्र एवं धार्मिक धरोहर की मुख्य संरक्षिका है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९३)”
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“महाभारत के रचयिता ने भौतिक युद्ध की अनिवार्यता का नहीं वरन् उसकी निरर्थकता का प्रतिपादन किया है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ९७)”
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“स्वामी की आज्ञा का अनिवार्य रूप से पालन करना परतंत्रता है परंतु पिता की आज्ञा का स्वेच्छा से पालन करना पुत्रत्व का गौरव प्रदान करती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ २२७)”
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“भारतीयों के एक वर्ग को दूसरेे के प्रति शत्रुता की भावना से देखने के लिए प्रेरित करने वाली मनोवृत्ति आत्मघाती है। यह मनोवृत्ति परतंत्रता को चिरस्थायी बनानेे में ही उपयुक्त होगी। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ ३५२)”
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“स्वतंत्रता एक जन्म की भांति है। जब तक हम पूर्णत : स्वतंत्र नहीं हो जाते तब तक हम परतंत्र ही रहेंगे। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ३११)”
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“आधुनिक सभ्यता ने हमें रात को दिन में और सुनहरी खामोशी को पीतल के कोलाहल और शोरगुल में परिवर्तित करना सिखाया है। -- (ट्रुथ इज गॉड, १९५५ पृष्ठ ६०)”
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“मनुष्य तभी विजयी होगा जब वह जीवन-संघर्ष के बजाय परस्पर-सेवा हेतु संघर्ष करेगा। -- (महात्मा, भाग ४ के पृष्ठ ३६)”
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“अयोग्य व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी दूसरे अयोग्य व्यक्ति के विषय में निर्णय दे। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २२३)”
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“धर्म के बिना व्यक्ति पतवार बिना नाव के समान है। -- (महात्मा, भाग ३ के पृष्ठ २२३)”
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“सादगी ही सार्वभौमिकता का सार है। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ ८२)”
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“अहिंसा पर आधारित स्वराज्य में, व्यक्ति को अपने अधिकारों को जानना उतना आवश्यक नहीं है जितना कि अपने कर्तव्यों का ज्ञान होना। -- (माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, १९६८, पृष्ठ २९२)”
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“मजदूर के दो हाथ जो अर्जित कर सकते हैं वह मालिक अपनी पूरी संपत्ति द्वारा भी प्राप्त नहीं कर सकता। -- (महात्मा, भाग ७ के पृष्ठ ३३)”
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“अपनी भूलों को स्वीकारना उस झाडू के समान है जो गंदगी को साफ कर उस स्थान को पहले से अधिक स्वच्छ कर देती है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ८४)”
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“पराजय के क्षणों में ही नायकों का निर्माण होता है। अंतः सफलता का सही अर्थ महान असफलताओं की श्रृंखला है। -- (महात्मा, भाग २ के पृष्ठ ८४)”
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“थोडा सा अभ्यास बहुत सारे उपदेशों से बेहतर है।”
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“पूर्ण धारणा के साथ बोला गया "नहीं" सिर्फ दूसरों को खुश करने या समस्या से छुटकारा पाने के लिए बोले गए “हाँ” से बेहतर है।”
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“पूंजी अपने-आप में बुरी नहीं है, उसके गलत उपयोग में ही बुराई है। किसी ना किसी रूप में पूंजी की आवश्यकता हमेशा रहेगी।”
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“मैं मरने के लिए तैयार हूँ, पर ऐसी कोई वज़ह नहीं है जिसके लिए मैं मारने को तैयार हूँ।”
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“जब मैं निराश होता हूँ, मैं याद कर लेता हूँ कि समस्त इतिहास के दौरान सत्य और प्रेम के मार्ग की ही हमेशा विजय होती है। कितने ही तानाशाह और हत्यारे हुए हैं, और कुछ समय के लिए वो अजेय लग सकते हैं, लेकिन अंत में उनका पतन होता है। इसके बारे में सोचो- हमेशा।”
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“उपदेश करने से पहले खुद के गुण देखने चाहिए।”
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“सुखद जीवन का भेद त्याग पर आधारित है। त्याग ही जीवन है।”
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“जब तक गलती करने की स्वतंत्रता ना हो तब तक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है।”
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“हमें अपने कर्मों से ही भविष्य का निर्माण करना है, किस्मत से नहीं।”
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“युद्ध की आग अस्थायी जीत दे सकती है, पर शांति केवल अहिंसा की धरती पर ही फलती है। ( स्रोत: युद्ध और अहिंसा, महात्मा गांधी, 1941 )”
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“अहिंसा वीरों का गुण है। डरपोक और अहिंसा कभी साथ नहीं चलते। (स्रोत: युद्ध और अहिंसा, महात्मा गांधी, 1941)”
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“आधुनिक विज्ञान और उद्योग की अंधाधुंध प्रगति ने हमारी नैतिक विचारधारा को कमजोर कर दिया है—सच्चा विकास वह है जो आत्मबल में वृद्धि करे। (स्रोत: हिन्द स्वराज , 1909)”
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“पश्चिमी सभ्यता शरीर की, भारतीय सभ्यता आत्मा की सेवा करती है। (स्रोत: हिन्द स्वराज, 1909)”
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“सच्चा धर्म वह है जो मन, वाणी और कर्म से सत्य का पालन करना सिखाए। (स्रोत: हिन्द स्वराज, 1909)”
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“स्वराज हथियारों से नहीं, आत्मबल से प्राप्त होता है। (स्रोत: हिन्द स्वराज, 1909)”
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“सभ्यता वह आचरण है जिससे हम कर्तव्य निभाते हैं और इच्छाओं पर नियंत्रण रखते हैं। (स्रोत: हिन्द स्वराज, 1909)”
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“मनुष्य की सबसे बड़ी विजय, अपने ऊपर विजय पाना है। (स्रोत: सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी (1927))”
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