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दयानन्द सरस्वती
106 quotes
“भगवान का ना कोई रूप है ना रंग है। वह अविनाशी और अपार है, जो भी इस दुनिया में दिखता है वह उसकी महानता का वर्णन करता है।”
दयानन्द सरस्वती (1824–1883) said by 1883 at the latest wikiquote:hi, CC BY-SA 4.0 source
“किसी भी रूप में प्रार्थना प्रभावी है क्योंकि यह एक क्रिया है इसलिए इसका परिणाम होगा। यह इस ब्रह्मांड का नियम है जिसमें हम खुद को पाते हैं।”
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“आप दूसरों को बदलना चाहते हैं ताकि आप आजाद रह सकें लेकिन, ये कभी ऐसे काम नहीं करता। दूसरों को स्वीकार करिए और आप मुक्त हैं।”
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“अगर आप पर हमेशा ऊंगली उठाई जाती रहे तो आप भावनात्मक रूप से अधिक समय तक खड़े नहीं हो सकते।”
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“गीत व्यक्ति के मर्म का आह्वान करने में मदद करता है और बिना गीत के मर्म को छूना मुश्किल है।”
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“धन एक वस्तु है जो ईमानदारी और न्याय से कमाई जाती है, इसका विपरीत है अधर्म का खजाना।”
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“प्रबुद्ध होना- ये कोई घटना नहीं हो सकती. जो कुछ भी यहाँ है वह अद्वैत है। ये कैसे हो सकता है? यह स्पष्टता है।”
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“कोई मूल्य तब मूल्यवान है जब मूल्य का मूल्य स्वंय के लिए मूल्यवान हो।”
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“जीह्वा को उसे व्यक्त करना चाहिए जो हृदय में है।”
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“वेद ईश्वरीय ज्ञान हैं। उनमें कोई बात ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव से विपरीत नहीं है। कोई बात सृष्टि क्रम के विपरीत नहीं है। वेद का ज्ञान परमात्मा ने मनुष्यों को उन्नति करने में सहायता देने के लिए दिया है। वेद का अर्थ प्रत्यक्ष, अनुमान आदि प्रमाणों के अनुकूल होना चाहिए। वेद में सभी सत्य विद्या एवं विज्ञानों का वर्णन है।”
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“जो पक्षपातरहित न्याय, सत्य का ग्रहण, असत्य का परित्याग पाँचों परीक्षाओं के अनुकूलाचरण, ईश्वराज्ञा का पालन, परोपकार करना आदि धर्म है और जो इससे विपरीत वह अधर्म कहाता है। क्योंकि जो सबके अविरुद्ध वह धर्म और जो परस्पर विरुद्धाचरण सो अधर्म क्योंकर न कहावे ?”
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“हमें अज्ञान को दूर करना चाहिए और ज्ञान को बढ़ावा देना चाहिए।”
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“ईश्वर समस्त सत्य ज्ञान और ज्ञान से ज्ञात होने वाली सभी बातों का कारण है।”
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“सत्य को ग्रहण करने और असत्य को त्यागने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए।”
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“सभी के प्रति हमारा आचरण प्रेम, धार्मिकता और न्याय से निर्देशित होना चाहिए।”
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“किसी को भी केवल अपना भला करने से संतुष्ट नहीं होना चाहिए; इसके विपरीत, सभी का भला करने में अपना भला देखना चाहिए।”
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“मनुष्य को हमेशा सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए, चाहे राह में कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न आएं।”
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“वह अच्छा और बुद्धिमान है जो हमेशा सच बोलता है, धर्म के अनुसार काम करता है और दूसरों को उत्तम और प्रसन्न बनाने का प्रयास करता है।”
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“वेदों का अध्ययन जीवन में सही दिशा देता है, क्योंकि वे सत्य और धर्म का स्रोत हैं।”
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“सत्य को किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती, सत्य स्वयं में सिद्ध होता है।”
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“वर्तमान जीवन का कार्य अन्धविश्वास पर पूर्ण भरोसे से अधिक महत्त्वपूर्ण है।”
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“जो पक्षपात रहित न्याय, सत्य का ग्रहण, असत्य का सर्वथा परित्याग रूप आचार है उसी का नाम धर्म है।”
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“मेरी उँगलियों को चाहे बत्ती बना कर जला दिया जाए, फिर भी मैं सत्य के साथ समझौता नहीं करूंगा।”
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“इस ग्रंथ (सत्यार्थ प्रकाश) को बनाने का प्रयोजन सत्य अर्थ का प्रकाश करना है। अर्थात् जो सत्य है उस को सत्य और जो मिथ्या है उस को मिथ्या प्रतिपादित करना है, जो जैसा है, उसको वैसा ही कहना, लिखना और मानना सत्य कहाता है। जो मनुष्य पक्षपाती होता है, वह अपने असत्य को भी सत्य और दूसरे विरोधी मत वाले के सत्य को भी असत्य सिद्ध करने में प्रवृत्त रहता है, इसलिए सत्य मत को प्राप्त नहीं हो सकता। सत्योपदेश ही मनुष्य जाति की उन्नति का कारण होता है। -- अपनी अमर कृति सत्यार्थ प्रकाश की भूमिका में ॠषि दयानंद सरस्वती”
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“सत्यमेव जयति नानृतं, सत्येन पन्था विततो देवयानी:" - अर्थात् सर्वदा सत्य की विजय और असत्य की पराजय होती है और सत्य ही से विद्वानों का मार्ग विस्तृत होता है।”
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“सत्य और असत्य को ठीक प्रकार से जानने के लिए पाँच प्रकार से परीक्षा करनी चाहिए-”
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“गुण-कर्म-स्वभाव आधारित वर्ण व्यवस्था ही वेद सम्मत है।”
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“वेद पढ़ना प्रत्येक मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है। सब मनुष्यों को बिना भेदभाव के समान अधिकार मिलने चाहिए. कोई व्यक्ति जन्म के आधार पर ऊंचा या नीचा नहीं हो सकता।”
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“यज्ञोपवीत विद्या का चिह्न है और इतिहास में अनेक विदुषी नारियों का उल्लेख आता है। अतः पुरुषों की भांति स्त्रियों को भी यज्ञोपवीत पहनने का समान अधिकार है।”
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“जो तुम स्त्रियों के पढ़ने का निषेध करते हो, वह तुम्हारी मूर्खता, स्वार्थता और निर्बुद्विता का प्रभाव है।”
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“भला जो पुरुष विद्वान और स्त्री अविदुषी तथा स्त्री विदुषी व पुरुष अविद्वान हो, तो नित्यप्रति देवासुर संग्राम घर में ही मचा रहे, फिर सुख कहां?”
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“इससे अधिक हृदय-विदारक, दारुण वेदना और क्या हो सकती है कि विधवाओं की दुखभरी आहों से, अनाथों के निरंतर आर्तनाद से और गो-वध से इस देश का सर्वनाश हो रहा है?”
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“राजनियम और जाति नियम होना चाहिए कि पाँचवें अथवा आठवें वर्ष से आगे कोई अपने लड़कों और लड़कियों को घर में न रख सके, पाठशाला में अवश्य भेज देवें। जो न भेजे वह दण्डनीय हो। -- सत्यार्थ प्रकाश के तीसरे समुल्लास में”
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“सच्चा ज्ञान वही है, जो आपको अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए।”
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“शिक्षा का उद्देश्य केवल रोज़गार प्राप्त करना नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और आत्मज्ञान प्राप्त करना है।”
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“शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को केवल विद्वान बनाना नहीं, बल्कि उसे सद्गुणी और नैतिकता से युक्त बनाना है।”
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“हर मनुष्य का अधिकार है कि वह शिक्षा प्राप्त करे, चाहे उसका जन्म किसी भी वर्ग या जाति में क्यों न हुआ हो।”
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“अज्ञानता ही सभी बुराइयों की जड़ है, और शिक्षा का कार्य है इस अंधकार को समाप्त करना।”
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“यदि स्त्रियों को शिक्षा से वंचित रखा गया, तो समाज का आधा हिस्सा हमेशा अंधकार में रहेगा।”
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“विद्यार्थियों को मातृभाषा में शिक्षा देना ही सही ज्ञान का आधार है।”
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“वेदों का ज्ञान ही मानवता के कल्याण का मार्ग दिखाता है।”
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“अज्ञानी होना गलत नहीं है, अज्ञानी बने रहना गलत है।”
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“भारत भारतीयों का है, और हमें किसी भी विदेशी शासन को स्वीकार नहीं करना चाहिए।”
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“स्वाधीनता मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है, इसे किसी भी स्थिति में छीना नहीं जा सकता।”
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“जो व्यक्ति सबसे कम ग्रहण करता है और सबसे अधिक योगदान देता है वह परिपक्कव है, क्योंकि ऐसे व्यक्ति के जीने में ही आत्म-विकास निहित होता है।”
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“सभी मनुष्य जन्म से समान हैं, किसी के साथ जाति या धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए।”
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“प्रत्येक मनुष्य को अपनी धार्मिक और राजनीतिक स्वतंत्रता का अधिकार होना चाहिए।”
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“शासन का उद्देश्य केवल शासन करना नहीं, बल्कि जनकल्याण करना होना चाहिए।”
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“दुनिया को अपना सर्वश्रेष्ठ दीजिये और आपके पास सर्वश्रेष्ठ लौटकर आएगा।”
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“जो देश आत्मनिर्भर नहीं होता, वह कभी स्वतंत्र नहीं रह सकता।”
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